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श्वेताश्वतर • अध्याय 3 • श्लोक 2
एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमांल्लोकानीशत ईशनीभिः। प्रत्यङ्जनांस्तिष्ठति सञ्चुकोचान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः॥
जो जगतों की रक्षा तथा उन पर शासन करता है वह, रुद्र, वास्तव में केवल एक ही है। उसके समीप कोई नहीं है जो उसे दूसरा बना सके। वह सभी प्राणियों के हृदय में विद्यमान है। सभी जगतों का सृजन और पालन करने के बाद अन्त में वह अपने आप में इसे निवर्तित कर लेता है।
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