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श्वेताश्वतर • अध्याय 3 • श्लोक 13
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः। हृदा मन्वीशो मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥
अनन्त पुरुष अंगुष्ठमात्र आकार में बुद्धि, भावना, कल्पना तथा संकल्प के द्वारा सभी प्राणियों के हृदय में उनकी अन्तरात्मा के रूप में निवास करता है। जो इस सत्य को अनुभव कर लेते हैं वे अमृतत्व प्राप्त कर लेते हैं।
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