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श्वेताश्वतर • अध्याय 3 • श्लोक 20
अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः। तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम्‌॥
सूक्ष्मतम से भी सूक्ष्मतर तथा महानतम से भी महानतर आत्मन प्राणियों के हृदय में छिप गया है। विधाता की कृपा से व्यक्ति शोक और कामना से मुक्त होकर उसे परमात्मन के रूप में जान लेता है।
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