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श्वेताश्वतर • अध्याय 3 • श्लोक 7
ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम्‌। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वाऽमृता भवन्ति॥
इस व्यक्तिगत ब्रह्म से उच्चतर है अनन्त परम ब्रह्म जो सभी सत्ताओं में उनके रूपों के अनुसार छिपे हुए हैं तथा जो एकल हैं फिर भी समस्त ब्रह्माण्ड को आवृत किये हुए हैं। जो उनको परमेश्वर के रूप में जान जाता है वह अमृत बन जाता है।
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