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श्वेताश्वतर • अध्याय 3 • श्लोक 1
य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वांल्लोकानीशत ईशनीभिः। य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥
जगत के सृजन और प्रलय के समय वही अकेला अभिन्न एकं विद्यमान रहता है। वह अपनी अबोधगम्य माया की शक्तियों का स्वामी होने के कारण परम प्रभु है। वही सभी जगतों की रक्षा करता है ओर उनमें कार्यरत बहुविध शक्तियों का नियन्त्रण करता है । जो इस परम सत्ता को सिद्ध कर लेता है वह मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है।
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