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अध्याय 2 — द्वितीयोऽध्यायः
श्वेताश्वतर
17 श्लोक • केवल अनुवाद
सत्य को प्राप्त करने के लिए प्रथमतः मन तथा इन्द्रियों को वश में करके तथा अग्नि की ज्योति को देखकर विकसनशील आत्मा ने अपने आप को पृथ्वी से ऊपर निकाल लिया।
आत्म-प्रकाशित अन्तस्थ आत्मा अभिव्यक्त हो सके इसके लिए अपने मन को नियन्त्रित कर हम सबलता के साथ परम आनन्द की प्राप्ति के लिए प्रयास करेंगे।
मन तथा बुद्धि की सहायता से, स्वर्ग की अभीप्सा करनेवाली इन्द्रियों को नियन्त्रित करके, अन्तस्थ आत्मा उन्हें इस प्रकार पुनर्जीवित करती है कि वे आत्म-प्रकाशित अनन्त ज्योति को अभिव्यक्त कर सकें।
अन्तस्थ आत्मा की महिमा महान है जो सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, अनन्त और आत्म-प्रकाशित है। केवल कुछ ही इने गिने लोग होंगे जो जानते हैं और आवश्यक अनुशासन तथा योगाभ्यास का पालन करते हैं। ज्ञानीजन वास्तव में बुद्धि की गतिविधियों को नियन्त्रित करते हैं तथा ध्यान और एकाग्रता का अभ्यास करते हैं।
ज्ञानियों के चरण-चिह्नों का अनुगमन करते हुए मैं निरन्तर ध्यान के द्वारा तुम दोनों का अनादि ब्रह्म में विलयन करता हूँ। महिमामय एकं प्रभु अपने आप को अभिव्यक्त करें! अमृत आनन्द के पुत्र मेरी बात सुनेंवे भी जो दिव्य धाम में निवास करते हैं।
जहाँ अग्नि का मन्थन किया जाता है, वायु को नियंत्रित किया जाता है, जहाँ सोम रस छलकता है, वहाँ मन पूर्णता को प्राप्त कर लेता है।
जिसे प्राप्त कर लेने के बाद तू पूर्व जन्म के कर्मों के मूल को नष्ट कर देता है और उनके परिणामों से दुःखी नहीं होता — उस सनातन ब्रह्म की अन्तस्थ आत्मा के द्वारा भक्ति कर।
छाती, गला तथा सिर के साथ पूरे शरीर को एक सीध में रखकर तथा इन्द्रियों और मन को हृदय में एकाग्र कर ब्रह्म की नौका के द्वारा जिज्ञासु विद्वान को सभी भयानक प्रवाहों के पार चले जाना चाहिये।
प्रयास के साथ अपनी इन्द्रियों को नियंत्रण में रखते हुए प्राण के क्षीण होने पर नासिका से उच्छवास लेकर जिज्ञासु विद्वान को बिना प्रमत्त हुए मन को वश में रखना चाहिये जैसे सारथि चंचल घोड़ों को लगाम से नियन्त्रित रखता है।
ऐसे अनुकूल स्थान पर योग या ध्यान करना चाहिये जो सम हो, कंकड़-पत्थर से रहित हो, जहाँ प्रियदर्शी दृश्य हों, जो वात, धूल, अग्नि, सीलन, कोलाहल से मुक्त हो।
योग के अभ्यास में ब्रह्म-दर्शन के पूर्व कोहरा, धूम्र, सूर्य, वायु, अग्नि, खद्योत, बिजली, स्फटिक तथा चन्द्र दिखाई देते हैं।
जब योगी के समक्ष योग के द्वारा योग के पाँच गुण प्रकट हो जाते हैं तब उसे योगाग्नि से बना शरीर प्राप्त हो जाता है और तब वह रोग, जरा, मृत्यु से मुक्त हो जाता है।
कहा जाता है कि योग में प्रवेश करने से योग का पहला परिणाम यह होता है कि शरीर हलका और स्वस्थ हो जाता है, मन की लालसाएं मिट जाती हैं, शरीर का वर्ण कान्तियुक्त हो जाता है, स्वर में माधुर्य आ जाता है, शरीर से सुगंध आती है तथा शरीर का मलोत्सर्जन बहुत अल्प हो जाता है।
जिस प्रकार धूल में लिप्त धातु की मूर्ति धुल जाने से चमकने लगती है, उसी प्रकार देही आत्मा आत्मन के सत्य के दर्शन से कृतार्थ हो जाती है, अपने लक्ष्य एकत्व को प्राप्त कर शोक से मुक्त हो जाती है।
जब योगी इस शरीर में स्थित आत्म तत्व के सत्य के द्वारा ब्रह्म तत्व के सत्य को आत्म-प्रकाशित सत्ता के रूप में अनुभव कर लेता है, तब उस सत्ता को अजन्मा, शाश्वत तथा प्रकृति के सभी तत्वों सें मुक्त और शुद्ध जान कर वह सभी बन्धनों से छूट जाता है।
यह देव सभी दिशाओं में सर्वत्र व्याप्त है। यह हिरण्यगर्भ के रूप में सबसे पहले प्रकट हुआ। गर्भ में प्रवेश कर केवल यही जन्म लेता है और भविष्य में जन्म लेगा। यह सभी मनुष्यों के अन्दर निवास करनेवाला आत्मन है जिसका मुख सभी दिशाओं की ओर रहता है।
उस देव को बार-बार नमस्कार है जो अग्नि में, जल में, सभी भुवनों में, औषधियों में, वनस्पतियों में व्याप्त है।
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