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श्वेताश्वतर • अध्याय 2 • श्लोक 15
यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत्‌। अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपापैः॥
जब योगी इस शरीर में स्थित आत्म तत्व के सत्य के द्वारा ब्रह्म तत्व के सत्य को आत्म-प्रकाशित सत्ता के रूप में अनुभव कर लेता है, तब उस सत्ता को अजन्मा, शाश्वत तथा प्रकृति के सभी तत्वों सें मुक्त और शुद्ध जान कर वह सभी बन्धनों से छूट जाता है।
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