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श्वेताश्वतर • अध्याय 2 • श्लोक 8
त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य। ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान्स्रोतांसि सर्वाणि भयानकानि॥
छाती, गला तथा सिर के साथ पूरे शरीर को एक सीध में रखकर तथा इन्द्रियों और मन को हृदय में एकाग्र कर ब्रह्म की नौका के द्वारा जिज्ञासु विद्वान को सभी भयानक प्रवाहों के पार चले जाना चाहिये।
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