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श्वेताश्वतर • अध्याय 2 • श्लोक 3
युक्त्वाय मनसा देवान्सुवर्यतो धिया दिवम्‌। बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान्‌॥
मन तथा बुद्धि की सहायता से, स्वर्ग की अभीप्सा करनेवाली इन्द्रियों को नियन्त्रित करके, अन्तस्थ आत्मा उन्हें इस प्रकार पुनर्जीवित करती है कि वे आत्म-प्रकाशित अनन्त ज्योति को अभिव्यक्त कर सकें।
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