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श्वेताश्वतर • अध्याय 2 • श्लोक 14
यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्‌सुधान्तम्‌। तद्वात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही एकः कृतार्थो भवते वीतशोकः॥
जिस प्रकार धूल में लिप्त धातु की मूर्ति धुल जाने से चमकने लगती है, उसी प्रकार देही आत्मा आत्मन के सत्य के दर्शन से कृतार्थ हो जाती है, अपने लक्ष्य एकत्व को प्राप्त कर शोक से मुक्त हो जाती है।
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