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श्वेताश्वतर • अध्याय 2 • श्लोक 10
समे शुचौ शर्करावह्निवालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः। मनोनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत्‌॥
ऐसे अनुकूल स्थान पर योग या ध्यान करना चाहिये जो सम हो, कंकड़-पत्थर से रहित हो, जहाँ प्रियदर्शी दृश्य हों, जो वात, धूल, अग्नि, सीलन, कोलाहल से मुक्त हो।
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