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श्वेताश्वतर • अध्याय 2 • श्लोक 9
प्राणान्प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत। दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धारयेताप्रमत्तः॥
प्रयास के साथ अपनी इन्द्रियों को नियंत्रण में रखते हुए प्राण के क्षीण होने पर नासिका से उच्छवास लेकर जिज्ञासु विद्वान को बिना प्रमत्त हुए मन को वश में रखना चाहिये जैसे सारथि चंचल घोड़ों को लगाम से नियन्त्रित रखता है।
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