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श्वेताश्वतर • अध्याय 2 • श्लोक 6
अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राधिरुध्यते। सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र सञ्जायते मनः॥
जहाँ अग्नि का मन्थन किया जाता है, वायु को नियंत्रित किया जाता है, जहाँ सोम रस छलकता है, वहाँ मन पूर्णता को प्राप्त कर लेता है।
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