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श्वेताश्वतर • अध्याय 2 • श्लोक 16
एष ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः। स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः॥
यह देव सभी दिशाओं में सर्वत्र व्याप्त है। यह हिरण्यगर्भ के रूप में सबसे पहले प्रकट हुआ। गर्भ में प्रवेश कर केवल यही जन्म लेता है और भविष्य में जन्म लेगा। यह सभी मनुष्यों के अन्दर निवास करनेवाला आत्मन है जिसका मुख सभी दिशाओं की ओर रहता है।
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