Krishjan
🇺🇸 EN
🇮🇳 हिन्दी
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
अध्याय 1 — माण्डूक्योपनिषद
माण्डूक्य
12 श्लोक • केवल अनुवाद
ॐ
—यह
एक अक्षर
ही
समस्त जगत्
है। इसका विस्तारपूर्वक वर्णन यह है कि
भूत
(भूतकाल)
,
भव
(वर्तमान)
और
भविष्यत्
(भविष्यकाल)
—जो कुछ भी है, वह सब
ॐकार
ही है। और जो कुछ
तीनों कालों से परे
है, वह भी
ॐकार
ही है।
यह सम्पूर्ण जगत् वास्तव में ब्रह्म ही है।
यह
आत्मा
भी
ब्रह्म
है। और यह
आत्मा
(अनुभव की दृष्टि से)
चार पादों
(चार अवस्थाओं या रूपों)
वाला कहा गया है।
जिसका
स्थान जाग्रत अवस्था
है, जो
बाह्य विषयों का ज्ञान रखने वाला
(बहिःप्रज्ञ)
है, जो
सप्ताङ्ग
और
उन्नीस मुखों वाला
है, तथा जो
स्थूल विषयों का भोक्ता
है, वह
वैश्वानर
(जाग्रत अवस्था का आत्मा)
आत्मा का प्रथम पाद
है।
जिसका
स्थान स्वप्नावस्था
है, जो
अन्तर्मुख ज्ञान वाला
(अन्तःप्रज्ञ)
है, जो
सप्ताङ्ग
और
उन्नीस मुखों वाला
है, तथा जो
सूक्ष्म और मानसिक विषयों का भोक्ता
(प्रविविक्तभुक्)
है, वह
तैजस
(स्वप्नावस्था का आत्मा)
आत्मा का द्वितीय पाद
है।
जिस अवस्था में
सोया हुआ जीव
न किसी
कामना
की इच्छा करता है और न कोई
स्वप्न
देखता है, वह
सुषुप्ति
(गहन निद्रा)
कहलाती है। उस
सुषुप्ति अवस्था
में स्थित, जहाँ सब कुछ
एकीभूत
हो जाता है, जो
प्रज्ञानघन
(चैतन्य का सघन रूप)
है, जो
आनन्दमय
और
आनन्द का भोक्ता
है, तथा जो
चेतना का द्वार
(चेतोमुख)
है, वह
प्राज्ञ
(सुषुप्ति-अवस्था का आत्मा)
आत्मा का तृतीय पाद
है।
यही
सर्वेश्वर
है,
यही सर्वज्ञ
है,
यही अन्तर्यामी
है, और
यही समस्त जगत् का कारण
है; क्योंकि
समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और लय
इसी से होती है।
वह
न अन्तःप्रज्ञ
है,
न बहिःप्रज्ञ
है,
न दोनों प्रकार का
है,
न प्रज्ञानघन
(केवल चेतना का एक घन रूप)
है,
न ज्ञाता
है और
न अज्ञाता
है। वह
अदृष्ट
(इन्द्रियों से अगोचर)
,
अव्यवहार्य
(व्यवहार का विषय नहीं)
,
अग्राह्य
(ग्रहण न किया जा सकने वाला)
,
अलक्षण
(किसी लक्षण से निरूपित न होने वाला)
,
अचिन्त्य
(मन की पहुँच से परे)
और
अव्यपदेश्य
(शब्दों द्वारा वर्णन न किया जा सकने वाला)
है। वह
एक आत्मा के प्रत्यक्ष अनुभव में ही साररूप से ज्ञेय
है,
समस्त प्रपञ्च का उपशम
है,
शान्त
है,
शिव
(मंगलस्वरूप)
है और
अद्वैत
है। उसे ही
चतुर्थ
(तुरीय)
कहा जाता है।
वही आत्मा है, और वही जानने योग्य है
।
यह
आत्मा
ही
अक्षररूप ॐकार
है।
अधिमात्रा
(ॐकार के विचार में)
इसके
पाद
ही इसकी
मात्राएँ
हैं, और
मात्राएँ
ही इसके
पाद
हैं। वे
अकार
,
उकार
और
मकार
हैं।
जाग्रत अवस्था में स्थित वैश्वानर
ॐकार की प्रथम मात्रा
, अर्थात्
अकार
है। क्योंकि
अकार
व्याप्ति
(आप्ति)
और
आदि होने
के कारण ऐसा कहा गया है। जो पुरुष इस प्रकार जानता है, वह
समस्त कामनाओं को प्राप्त
करता है और
श्रेष्ठता तथा अग्रता
को प्राप्त होता है।
स्वप्नावस्था में स्थित तैजस
ॐकार की द्वितीय मात्रा
, अर्थात्
उकार
है। क्योंकि
उकार
उत्कर्ष
(श्रेष्ठता)
और
मध्यस्थता
(उभयत्व)
के कारण ऐसा कहा गया है। जो पुरुष इस प्रकार जानता है, वह
ज्ञान-परम्परा को उत्कर्ष
प्रदान करता है और
समभावयुक्त
हो जाता है। तथा उसके
कुल में ब्रह्म को न जानने वाला
कोई नहीं होता।
सुषुप्ति अवस्था में स्थित प्राज्ञ
ॐकार की तृतीय मात्रा
, अर्थात्
मकार
है। क्योंकि
मकार
मिति
(मापन)
और
अपीति
(लय अथवा समावेश)
के कारण ऐसा कहा गया है। जो पुरुष इस प्रकार जानता है, वह
इस सम्पूर्ण जगत् को मापने
(अर्थात् उसके यथार्थ स्वरूप को जानने)
में समर्थ हो जाता है और
समस्त का आश्रय तथा लयस्थान
बन जाता है।
चतुर्थ
(तुरीय)
अमात्र
है; वह
अव्यवहार्य
(व्यवहार का विषय नहीं)
,
प्रपञ्च का उपशम
,
शिव
(परम मंगलस्वरूप)
और
अद्वैत
है। इस प्रकार
ॐकार ही आत्मा
है। जो पुरुष इस प्रकार जानता है, वह
अपने आत्मा के द्वारा आत्मा में ही प्रवेश करता है
(अर्थात् आत्मस्वरूप में स्थित होकर ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है)
। जो इस प्रकार जानता है, वह वास्तव में
आत्मस्वरूप का साक्षात्कार
कर लेता है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें