जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्रा।
आप्तेरादिमत्वाद् वा आप्नोति ह वै सर्वान् कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥
जाग्रत अवस्था में रहने वाला वैश्वानर,‘ॐ’ की पहली मात्रा ‘अ’ है।
क्योंकि ‘अ’ सबकी शुरुआत (आदि) है और सबको व्याप्त (व्यापक) करता है, इसलिए जो व्यक्ति इसे इस प्रकार जानता है—वह सभी इच्छाओं को प्राप्त करता है और सबमें श्रेष्ठ (आदि, अग्रणी) बनता है।
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