मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
माण्डूक्य • अध्याय 1 • श्लोक 9
जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्रा। आप्तेरादिमत्वाद् वा आप्नोति ह वै सर्वान्‌ कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥
जाग्रत अवस्था में स्थित वैश्वानर ॐकार की प्रथम मात्रा, अर्थात् अकार है। क्योंकि अकार व्याप्ति (आप्ति) और आदि होने के कारण ऐसा कहा गया है। जो पुरुष इस प्रकार जानता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है और श्रेष्ठता तथा अग्रता को प्राप्त होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
माण्डूक्य के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

माण्डूक्य के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें