नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्।
अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥
यह (आत्मा का चौथा रूप)—
न तो भीतर जानने वाला है, न बाहर जानने वाला, न दोनों का मिला हुआ, न ही केवल चेतना का एक घन रूप है, न इसे सामान्य “जानना” कहा जा सकता है, और न ही “न जानना”।
यह इंद्रियों से दिखाई नहीं देता, इसका कोई व्यवहारिक रूप नहीं है, इसे पकड़ा या समझा नहीं जा सकता, इसका कोई लक्षण या चिन्ह नहीं है, यह विचार से परे है, और शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता।
यह केवल एक आत्मा के अनुभव का सार है, जहाँ पूरा संसार शांत हो जाता है, यह पूर्ण शांति, कल्याणकारी (शिव) और अद्वैत (एक ही सत्य) है।
इसे ही चौथा (तुरीय) कहा जाता है।
वही आत्मा है — और उसी को जानना चाहिए।
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