नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्। अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥
वह न अन्तःप्रज्ञ है, न बहिःप्रज्ञ है, न दोनों प्रकार का है, न प्रज्ञानघन(केवल चेतना का एक घन रूप) है, न ज्ञाता है और न अज्ञाता है।
वह अदृष्ट(इन्द्रियों से अगोचर), अव्यवहार्य(व्यवहार का विषय नहीं), अग्राह्य(ग्रहण न किया जा सकने वाला), अलक्षण(किसी लक्षण से निरूपित न होने वाला), अचिन्त्य(मन की पहुँच से परे) और अव्यपदेश्य(शब्दों द्वारा वर्णन न किया जा सकने वाला) है।
वह एक आत्मा के प्रत्यक्ष अनुभव में ही साररूप से ज्ञेय है, समस्त प्रपञ्च का उपशम है, शान्त है, शिव(मंगलस्वरूप) है और अद्वैत है। उसे ही चतुर्थ(तुरीय) कहा जाता है। वही आत्मा है, और वही जानने योग्य है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
माण्डूक्य के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
माण्डूक्य के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।