सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद ॥
सुषुप्ति (गहरी नींद) में स्थित प्राज्ञ, ‘ॐ’ की तीसरी मात्रा ‘म’ है।
क्योंकि ‘म’ समेटने (मापने/समाप्त करने) वाला है और सबको अपने में लय (विलीन) कर देता है, इसलिए जो व्यक्ति इसे इस प्रकार जानता है—वह सम्पूर्ण जगत को अपने में समाहित समझता है और अंततः सब कुछ अपने में विलीन अनुभव करता है।
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