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माण्डूक्य • अध्याय 1 • श्लोक 2
सर्वं ह्येतद्‌ ब्रह्म अयमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात्‌ ॥
यह सम्पूर्ण जगत वास्तव में ब्रह्म ही है। और यह आत्मा (हमारा सच्चा स्वरूप) भी ब्रह्म ही है। यह वही आत्मा है, जिसके चार रूप (या अवस्थाएँ) माने गए हैं।
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