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माण्डूक्य • अध्याय 1 • श्लोक 3
जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग् वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥
जिसका स्थान जाग्रत अवस्था है, जो बाह्य विषयों का ज्ञान रखने वाला (बहिःप्रज्ञ) है, जो सप्ताङ्ग और उन्नीस मुखों वाला है, तथा जो स्थूल विषयों का भोक्ता है, वह वैश्वानर (जाग्रत अवस्था का आत्मा) आत्मा का प्रथम पाद है।
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