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माण्डूक्य • अध्याय 1 • श्लोक 12
अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद य एवं वेद ॥
‘ॐ’ की जो चौथी अवस्था (अमात्र — जिसमें कोई ध्वनि नहीं है) है, वह व्यवहार से परे, जहाँ पूरा संसार शांत हो जाता है, वह शांत, कल्याणकारी (शिव) और अद्वैत (एकमात्र सत्य) है। इस प्रकार ‘ॐ’ ही वास्तव में आत्मा है। जो व्यक्ति इस सत्य को जान लेता है, वह आत्मा के द्वारा आत्मा में ही स्थित हो जाता है (अर्थात्‌ अपने सच्चे स्वरूप में स्थिर हो जाता है)।
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