मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
माण्डूक्य • अध्याय 1 • श्लोक 10
स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रा उत्कर्षादुभयत्वाद् वा उत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित् कुले भवति य एवं वेद ॥
स्वप्नावस्था में स्थित तैजस ॐकार की द्वितीय मात्रा, अर्थात् उकार है। क्योंकि उकार उत्कर्ष (श्रेष्ठता) और मध्यस्थता (उभयत्व) के कारण ऐसा कहा गया है। जो पुरुष इस प्रकार जानता है, वह ज्ञान-परम्परा को उत्कर्ष प्रदान करता है और समभावयुक्त हो जाता है। तथा उसके कुल में ब्रह्म को न जानने वाला कोई नहीं होता।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
माण्डूक्य के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

माण्डूक्य के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें