स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रा उत्कर्षादुभयत्वाद् वा उत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित् कुले भवति य एवं वेद ॥
स्वप्नावस्था में स्थित तैजसॐकार की द्वितीय मात्रा, अर्थात् उकार है। क्योंकि उकारउत्कर्ष(श्रेष्ठता) और मध्यस्थता(उभयत्व) के कारण ऐसा कहा गया है।
जो पुरुष इस प्रकार जानता है, वह ज्ञान-परम्परा को उत्कर्ष प्रदान करता है और समभावयुक्त हो जाता है। तथा उसके कुल में ब्रह्म को न जानने वाला कोई नहीं होता।
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