जिसका स्थान स्वप्नावस्था है, जो अन्तर्मुख ज्ञान वाला(अन्तःप्रज्ञ) है, जो सप्ताङ्ग और उन्नीस मुखों वाला है, तथा जो सूक्ष्म और मानसिक विषयों का भोक्ता(प्रविविक्तभुक्) है, वह तैजस(स्वप्नावस्था का आत्मा)आत्मा का द्वितीय पाद है।
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