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माण्डूक्य • अध्याय 1 • श्लोक 4
स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक् तैजसो द्वितीयः पादः ॥
जो आत्मा स्वप्न अवस्था में रहती है, जो भीतर (मन के अंदर) अनुभव करती है, जिसके सात अंग और उन्नीस मुख हैं, जो सूक्ष्म (मन में बने) विषयों का अनुभव करती है—वह तैजस कहलाती है। यह आत्मा का दूसरा रूप (द्वितीय पाद) है।
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