जिस अवस्था में सोया हुआ जीव न किसी कामना की इच्छा करता है और न कोई स्वप्न देखता है, वह सुषुप्ति(गहन निद्रा) कहलाती है।
उस सुषुप्ति अवस्था में स्थित, जहाँ सब कुछ एकीभूत हो जाता है, जो प्रज्ञानघन(चैतन्य का सघन रूप) है, जो आनन्दमय और आनन्द का भोक्ता है, तथा जो चेतना का द्वार(चेतोमुख) है, वह प्राज्ञ(सुषुप्ति-अवस्था का आत्मा)आत्मा का तृतीय पाद है।
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