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माण्डूक्य • अध्याय 1 • श्लोक 5
यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत् सुषुप्तम्‌। सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्‌ चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥
जहाँ सोया हुआ व्यक्ति न कोई इच्छा करता है और न कोई स्वप्न देखता है, वह अवस्था सुषुप्ति (गहरी नींद) कहलाती है। इस अवस्था में आत्मा— - सब कुछ में एकरूप (एकीकृत) हो जाती है, - शुद्ध चेतना का घन (पूर्ण चेतन स्वरूप) होती है, - आनंदमय होती है और उसी आनंद का अनुभव करती है, - और चेतना का द्वार (कारण रूप) बनती है—उसे प्राज्ञ कहते हैं।
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