Krishjan
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अध्याय 3 — तृतीयः खण्डः
जाबाल दर्शन
16 श्लोक • केवल अनुवाद
हे मुनिश्रेष्ठ! आसन नौ प्रकार के कहे गये हैं - स्वस्तिक आसन, गोमुख आसन, पद्मासन, वीरासन, सिंहासन, मुक्तासन, भद्रासन, मयूरासन तथा सुखासन।
घुटनों एवं जाँघों के मध्य में अपने दोनों पैरों को भली-भाँति रखकर ग्रीवा, मस्तिष्क एवं शरीर को समान भाव से बनाये रखना ही स्वस्तिक आसन कहा जाता है।
इस आसन का प्रतिदिन अभ्यास करने का प्रयास करना चाहिए।
दाहिने पैर के टखने को बायीं ओर के पीछे भाग तक तथा बायें पैर के टखने को दाहिनी ओर के पीछे भाग तक ले जाये, इसी को गोमुखासन कहते हैं।
हे विप्र! दोनों पैरों को दोनों जाँघों पर रखकर उनके अंगूठों को दोनों हाथों से पीठ के पृष्ठ भाग से पकड़ ले। इसी को पद्मासन कहा जाता है। यह आसन सभी तरह के रोगों का भय हटाने वाला है।
बायें पैर को दाहिनी जाँघ के ऊपर रखे तथा शरीर को सीधा करके बैठे, यही वोरासन है।
दोनों टखनों को अण्डकोष के नीचे सीवनी के दोनों पार्श्वय भागों में ले जाकर उन्हें इस तरह से रखे कि बायें टखने से सीवनी का दक्षिण पार्श्वय और
दक्षिण टखने से सोवनी का बायाँ पार्श्वय सटा रहे। तदनन्तर दोनों हाथों को घुटनों पर रखकर अँगुलियों को फैला दे।
मुँह खोलकर एकाग्रचित्त हो घ्राणेन्द्रिय के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर रखे यही सिंहासन है।
दोनों टखनों को अण्डकोष के नीचे सीवनी के दोनों पार्श्वभागों में लगाकर रखे तथा दोनों हाथों से पार्श्वभाग एवं पैरों को दृढ़तापूर्वक बाँध करके एकाग्रतापूर्वक बैठे, इस स्थिति को 'भद्रासन' कहते हैं। यह समस्त विषयुक्त रोगों का शमन करने वाला है।
सीवनी की सूक्ष्म रेखा को बायें टखने से दबाकर, दायें टखने से बायें को दबाने पर 'मुक्तासन' होता है।
हे मुने! मेड्र (जननेन्द्रिय) के ऊपर बायें टखने को रखे तथा उसके ऊपर दायाँ टखना रखे, यह स्थिति भी 'मुक्तासन' कहलाती है।
हे मुनि श्रेष्ठ! अपनी दोनों हथेलियों को भूमि पर रखकर कुहनियों के अग्रभाग को नाभि के दोनों पाश्चों में लगाये।
तत्पश्चात् सिर एवं पैरों को ऊँचा करके आकाश में दण्ड के सदृश स्थित हो जाये। यह मयूर आसन है, जो सभी तरह के पापों को विनष्ट करने वाला है।
जिस किसी भी तरह से बैठने में सुख एवं धैर्य बना रहे, वह आसन ही सुखासन है। अशक्त साधकों को इसी सुखासन का ही आश्रय लेना चाहिए।
जिसने इन आसनों को जीत लिया, उसने सम्पूर्ण त्रिलोको को अपने वश में कर लिया। अतः हे साङ्कृते! इसी विधि से (योग) युक्त होकर तुम सदा ही प्राणायाम किया करो।
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