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जाबाल दर्शन • अध्याय 3 • श्लोक 14
समुन्नतशिरः पादो दण्डवद्व्योग्नि संस्थितः । मयूरासनमेतत्स्यात्सर्वपापप्रणाशनम् ॥
तत्पश्चात् सिर एवं पैरों को ऊँचा करके आकाश में दण्ड के सदृश स्थित हो जाये। यह मयूर आसन है, जो सभी तरह के पापों को विनष्ट करने वाला है।
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