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जाबाल दर्शन • अध्याय 3 • श्लोक 4
दक्षिणेऽपि तथा सयं गोमुखं तत्प्रचक्षते । अङ्गुष्ठावधि गृह्णीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमेण तु ॥
दाहिने पैर के टखने को बायीं ओर के पीछे भाग तक तथा बायें पैर के टखने को दाहिनी ओर के पीछे भाग तक ले जाये, इसी को गोमुखासन कहते हैं।
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