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जाबाल दर्शन • अध्याय 3 • श्लोक 2
सुखासनसमाख्यं च नवमं मुनिपुङ्गव। जानूर्वोरन्तरे कृत्वा सम्यक् पादतले उभे ॥
घुटनों एवं जाँघों के मध्य में अपने दोनों पैरों को भली-भाँति रखकर ग्रीवा, मस्तिष्क एवं शरीर को समान भाव से बनाये रखना ही स्वस्तिक आसन कहा जाता है।
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