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अध्याय 75 — अथ सौभाग्यकरणाध्यायः
बृहत्संहिता
10 श्लोक • केवल अनुवाद
सुभग पुरुष के लिये कामदेवसम्बन्धी समस्त सुख श्रेष्ठ होते हैं। वी के मनोवियोग के कारण दुर्भग पुरुष को सुख का आभासमात्र होता है। दूर में रहती हुई ली भी जिस पुरुष का ध्यान करती है, उसके समान ही गर्भ धारण करती है।
जिस वृक्ष का कलम या बोज भूमि में बोया जाता है, वही वृक्ष उत्पन होता है. दूसरा नहीं। इसी तरह आधारभूत ही में फिर पुत्ररूप से आत्मा की ही उत्पति होती है। केवल क्षेत्र के योग से कुछ विशेष होता है। जिस प्रकार क्षेत्र के भेद से वृक्षों में भी साधारण भेद होता है, उसी तरह त्रियों में भी जानना चाहिये ।
मन के साथ आत्मा, इन्द्रिय के साथ मन और अपने विषय के साथ इन्द्रिय गमन करता है। यह आत्मा के जाने का शोघ्र क्रम और योग (सम्बन्ध) है। मन के लिये कोई स्थान अगम्य नहीं है तथा जहाँ मन जाता है, वहाँ आत्मा भी जाती है।
परमात्मा के हृदय में यह अतिसूक्ष्म जीवात्मा स्थित है। स्थिर चित्त से और निरन्तर अभ्यास सेः उसका साक्षात्कार कराए चाहिये; क्योंकि जो। जिसका निरन्तर चिन्तन करता है, वह तन्मय हो जाता है। इसलिये तो भी निरन्तर स्मरण करने से सुभग पुरुष को प्राप्त करती है।
ली के मनोनुकूल कार्य करना सुभगत्व का मुख्य कारण है तथा उसके प्रतिकूल आचरण करने से विद्वेषण होता है। विस्मयोत्पादक मन्त्र-औषधि आदि से त्री को बरा में करने से अनेक दोष उत्पत्र होते हैं, अच्छा नहीं होता है।
गर्व को छोड़ देने से मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है और गयीं मनुष्य दुभंगता को प्राप्त होता है तथा अभिमानी मनुष्य बड़ी कठिनता से कार्य की सिद्धि करता है: लेकिन मधुर वचन बोलते हुये बड़ी आसानी से अपना कार्य सिद्ध होता है।
असमीक्षित कार्यों को करने में प्रीति करने से तेज नहीं होता है तथा दुर्जनों के द्वारा प्रतिपादित प्रतिकूल वाक्य भी तेज नहीं है। जो मनुष्य कार्य को सम्पन्न करके भी अभिमान- रहित रहता है, वहीं तेजस्वी होता है; आत्मश्लाघी मनुष्य नहीं।
सर्वप्रिय होने की इच्छा करने वाले मनुष्य को परोक्ष में सबको प्रशंसा करनी चाहिये। जो मनुष्य दूसरे की निन्दा करता है, उसके ऊपर बहुत से निर्मूल दोष भो लगाये जाते हैं।
जो मनुष्य सबका उपकार करने में उद्यत होता है, उसका उपकार सभी मनुष्य करते हैं। विपत्ति में शत्रुओं का उपकार करने से जो कीर्ति मिलती है, वह अल्प पुण्य का फल नहीं है।
तृणों से आच्छादित हुये अग्नि की तरह छिपाये हुये गुण वृद्धि को ही प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य दूसरे के गुणों का नाश करना चाहता है, वह केवल दुर्जनता को प्राप्त करता है, गुण का नाश करने से भी कदापि उसका नाश नहीं होता है।
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