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बृहत्संहिता • अध्याय 75 • श्लोक 1
जात्यं मनोभवसुखं सुभगस्य सर्व- माभासमात्रमितरस्य मनोवियोगात् । चित्तेन भावयति दूरगताऽपि यं स्त्री गर्भ बिभर्ति सदृशं पुरुषस्य तस्य ॥
सुभग पुरुष के लिये कामदेवसम्बन्धी समस्त सुख श्रेष्ठ होते हैं। वी के मनोवियोग के कारण दुर्भग पुरुष को सुख का आभासमात्र होता है। दूर में रहती हुई ली भी जिस पुरुष का ध्यान करती है, उसके समान ही गर्भ धारण करती है।
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