सुभग पुरुष के लिये कामदेवसम्बन्धी समस्त सुख श्रेष्ठ होते हैं। वी के मनोवियोग के कारण दुर्भग पुरुष को सुख का आभासमात्र होता है। दूर में रहती हुई ली भी जिस पुरुष का ध्यान करती है, उसके समान ही गर्भ धारण करती है।
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