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बृहत्संहिता • अध्याय 75 • श्लोक 5
दाक्षिण्यमेकं सुभगत्यहेतुर्विद्वषणं तद्विपरीतचेष्टा । मन्त्रौषधायैः कुहकप्रयोगैर्भवन्ति दोषा बहवो न शर्म ॥
ली के मनोनुकूल कार्य करना सुभगत्व का मुख्य कारण है तथा उसके प्रतिकूल आचरण करने से विद्वेषण होता है। विस्मयोत्पादक मन्त्र-औषधि आदि से त्री को बरा में करने से अनेक दोष उत्पत्र होते हैं, अच्छा नहीं होता है।
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