तेजो न तद्यत् प्रियसाहसत्वं वाक्यं न चानिष्टमसत्प्रणीतम् । कार्यस्य गत्वान्तमनुद्धता ये तेजस्विनस्ते न विकत्थना ये ॥
असमीक्षित कार्यों को करने में प्रीति करने से तेज नहीं होता है तथा दुर्जनों के द्वारा प्रतिपादित प्रतिकूल वाक्य भी तेज नहीं है। जो मनुष्य कार्य को सम्पन्न करके भी अभिमान- रहित रहता है, वहीं तेजस्वी होता है; आत्मश्लाघी मनुष्य नहीं।
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