तृणैरिवाग्निः सुतरां विवृद्धिमाच्छाद्यमानोऽपि गुणोऽ भ्युपैति । स केवलं दुर्जनभावमेति हन्तुं गुणान् वा उति यः परस्य ॥
तृणों से आच्छादित हुये अग्नि की तरह छिपाये हुये गुण वृद्धि को ही प्राप्त होते हैं।
जो मनुष्य दूसरे के गुणों का नाश करना चाहता है, वह केवल दुर्जनता को प्राप्त करता
है, गुण का नाश करने से भी कदापि उसका नाश नहीं होता है।
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