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बृहत्संहिता • अध्याय 75 • श्लोक 3
आत्मा सर्हति मनसा मन इन्द्रियेण स्वार्थेन चेन्द्रियमिति क्रम एष शीघ्रः । योगोऽयमेव मनसः किमगम्यमस्ति यस्मिन् मनो व्रजति तत्र गतोऽयमात्मा ॥
मन के साथ आत्मा, इन्द्रिय के साथ मन और अपने विषय के साथ इन्द्रिय गमन करता है। यह आत्मा के जाने का शोघ्र क्रम और योग (सम्बन्ध) है। मन के लिये कोई स्थान अगम्य नहीं है तथा जहाँ मन जाता है, वहाँ आत्मा भी जाती है।
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