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बृहत्संहिता • अध्याय 75 • श्लोक 6
वाल्लभ्यमायाति विहाय मानं दौर्भाग्यमापादयतेऽभिमानः । कृच्छ्रेण संसाधयतेऽभिमानी कार्याण्ययत्नेन वदन् प्रियाणि ॥
गर्व को छोड़ देने से मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है और गयीं मनुष्य दुभंगता को प्राप्त होता है तथा अभिमानी मनुष्य बड़ी कठिनता से कार्य की सिद्धि करता है: लेकिन मधुर वचन बोलते हुये बड़ी आसानी से अपना कार्य सिद्ध होता है।
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