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बृहत्संहिता • अध्याय 75 • श्लोक 8
यः सार्वजन्यं सुभगत्वमिच्छेद् गुणान् स सर्वस्य वदेत् परोक्षम् । प्राप्नोति दोषानसतोऽप्यनेकान् परस्य यो दोषकथां करोति ॥
सर्वप्रिय होने की इच्छा करने वाले मनुष्य को परोक्ष में सबको प्रशंसा करनी चाहिये। जो मनुष्य दूसरे की निन्दा करता है, उसके ऊपर बहुत से निर्मूल दोष भो लगाये जाते हैं।
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