सर्वोपकारानुगतस्य लोकः सर्वोपकारानुगतो नरस्य । कृत्वोपकारं द्विषतां विपत्सु या कीर्तिरल्पेन न सा शुभेन ॥
जो मनुष्य सबका उपकार करने में उद्यत होता है, उसका उपकार सभी मनुष्य करते हैं। विपत्ति में शत्रुओं का उपकार करने से जो कीर्ति मिलती है, वह अल्प पुण्य का फल नहीं है।
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