आत्मायमात्मनि गतो ग्राह्योऽ चलेन मनसा हृदयेऽतिसूक्ष्मो सतताभियोगात् । यो यं विचिन्तयति याति स तन्मयत्वं यस्मादतः सुभगमेव गता युवत्यः ॥
परमात्मा के हृदय में यह अतिसूक्ष्म जीवात्मा स्थित है। स्थिर चित्त से और निरन्तर अभ्यास सेः उसका साक्षात्कार कराए चाहिये; क्योंकि जो। जिसका निरन्तर चिन्तन
करता है, वह तन्मय हो जाता है। इसलिये तो भी निरन्तर स्मरण करने से सुभग पुरुष को प्राप्त करती है।
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