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अध्याय 71 — अध वस्त्रच्छेदलक्षणाध्यायः

बृहत्संहिता
13 श्लोक • केवल अनुवाद
यदि अश्विनी नक्षत्र में नवीन व धारण करे तो बहुत पत्र का लाभ, भरणी में यतों की हानि, कृतिका में अग्नि सेव का जलन, रोहिणों में धन प्राप्ति
मृगशिरा में यत्र को चूरे का भय, आर्दा में मृत्यु, पुनर्वसु में शुभ की प्राप्ति, पुष्य में धन का लाभ, आश्लेश में बखनाश
पुष्य में धन का लाभ, आश्लेश में बखनाश, मया में मृत्यु, पूर्वपत्नी में राजा से भय, उत्तरफाल्गुनों में धन का लाभ, हस्त में कों की गिद्ध, चित्र में शुभ की प्राप्ति, स्वाती में उत्तम भोजन का लाभ,
उत्तरफाल्गुनों में धन का लाभ, हस्त में कों की गिद्ध, चित्र में शुभ की प्राप्ति, स्वाती में उत्तम भोजन का लाभ, विशाखा में जनरों का प्रिय अनुराधा में मित्रों का समागम,
ज्येष्ठा में जल का क्षय, मूल में अल में दूबने का भय पूर्वाषाढा में रोग, उत्तराषाढा में मिष्ठान का लाभ,
अव में नेत्ररोग, धनिष्ठा में का लाभ, शतभिषा में विष का अधिक भय, पूर्व भाद्रपद में जल का भय
उत्तरभाद्रपद में पुत्र का लाभ और रेवती नक्षत्र में नवीन व धरण करे तो रानलाभ होता है।
विवाह में, राजसम्मान में और ब्राह्मणों की आज्ञा मिलने पर अविहित नक्षत्र में भी यत्र धारण करना शुभ होता है।
नवधा विभक्त वत्र के चारो कोनों में देवता, पाशान्त मध्य (वत्र के मूल) और दशान्त मध्य (यत्त्र के अग्र) में मनुष्य तथा मध्यस्थित तीन भागों में राक्षस की कल्पना करनी चाहिये। इसी प्रकार शय्या, आसन और पादुका में भी विचार करना चाहिये।
यदि नवीन वस्त्र स्याही, गोबर, कीचड़ आदि से लिप्त हो जाय, जल जाय या फट जाय तो सम्पूर्ण अशुभ या शुभ फल जानना चाहिये। यदि मध्यम वत्र हो तो घोड़ा और बिल्कुल पुराना वत्र हो तो बहुत घोड़ा अशुभ या शुभ फल जानना चाहिये; किन्तु ओड़ने के वत्र हों तो अधिक अशुभ या शुभ फल होता है।
यदि राक्षसों के भाग में स्याही लग जाय तो रोग या मृत्यु, मनुष्यों के भाग में पुत्रजन्म और तेज का लाभ, देवताओं के भाग में भोग की वृद्धि तथा समस्त भागों के प्रान्त में स्याही आदि लग जाय तो अनिष्ट फल प्राप्त होता है; ऐसा मुनियों द्वारा कहा गया है।
यदि देवताओं के भाग में भी कङ्क, मेड़क, उल्लू, कबूतर, कौआ, मांसाहारी ( गिद्ध आदि), सियार, गदहा, ऊँट या साँप के समान वल के छेद आदि का आकार हो तो मृत्यु के समान भय उपस्थित करता है।
यदि राक्षसों के भाग में भी छत्र, ध्वज, स्वस्तिक, वर्धमान (चिह्नविशेष), बिल्व- पृक्ष, कलश, कमल, तोरण आदि (सुव, कुण्ड, भृङ्गार, हाथी और घोड़े) के समान छेद आदि का आकार हो तो बहुत शीघ्र लक्ष्मी का लाभ कराता है।
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