नवधा विभक्त वत्र के चारो कोनों में देवता, पाशान्त मध्य (वत्र के मूल) और
दशान्त मध्य (यत्त्र के अग्र) में मनुष्य तथा मध्यस्थित तीन भागों में राक्षस की कल्पना
करनी चाहिये। इसी प्रकार शय्या, आसन और पादुका में भी विचार करना चाहिये।
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