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अध्याय 40 — अथ सस्यजातकाध्यायः
बृहत्संहिता
14 श्लोक • केवल अनुवाद
वृश्चिक और वृष राशि में सूर्य का प्रवेश होने के समय ग्रीष्म और शरद् ऋतु में उत्पन्न होने वाले धान्यों के लिये जिन शुभाशुभ फलों को बादरायण मुनि ने कहा है, वे इस प्रकार हैं।
सूर्य के वृश्चिक में प्रवेश होने के समय उससे (सूर्य से) केन्द्र स्थान ( वृश्चिक, कुम्भ, वृष और सिंह) में शुमग्रह हों या जहाँ-कहीं पर (केन्द्र से इतर स्थान) स्थित बली शुभग्रहों से वृश्चिकगत सूर्य देखा जाता हो तो ग्रीष्म ऋतु में होने वाले धान्यों की वृद्धि होती है।
सूर्य के आठवीं राशि (वृश्चिक) में गत होने के समय कुम्भ राशि में गुरु और सिंह राशि में चन्द्रमा या सिंह राशि में गुरु और कुम्भ राशि में चन्द्रमा स्थित हो तो ग्रीष्म ऋतु में होने वाले धान्यों की निष्पत्ति (वृद्धि) होती है।
यदि सूर्य से द्वितीय या द्वादश में शुक्र या बुध या दोनों एक साथ स्थित हों तो ग्रीष्म ऋतु में होने वाले धान्यों की निष्पत्ति होती है। यदि पूर्वोक्त योगों में बृहस्पति की दृष्टि हो तो ग्रीष्म ऋतु में होने वाले धान्यों की उत्तम निष्पत्ति होती है ।
दो शुभ ग्रहों के मध्य में स्थित होकर सूर्य वृद्धिक राशि में स्थित हो और सूर्य से सप्तम में गुरु और चन्द्रमा हो तो धान्यों की उत्तम निष्पत्ति होती है तथा वृश्चिक के आदि में सूर्य और उससे द्वितीय में गुरु हो तो धान्यों की आधी निष्पत्ति होती है।
यदि वृश्चिक राशि में स्थित सूर्य से एकादश में शुक्र, चतुर्म में चन्द्र और द्वितीय में बुध स्थित हो तो धान्यों की उत्तम निष्पत्ति होती है। यदि पूर्वोक्त योग में दशम स्थित गुरु हो तो गायों में उत्तम सम्पत्ति (दूध की अधिकता) होती है।
यदि कुम्भ में गुरु, वृष में चन्द्रमा, वृश्चिक के आदि में सूर्य तथा मकर में मङ्गल और शनि स्थित हो तो धान्यों की अधिक निष्यत्ति होती है; किन्तु बाद में परचक्र का आगमन और रोग का भय होता है।
यदि वृश्चिक राशि में स्थित होकर सूर्य दो पापग्रहों के मध्य में स्थित हो तो धान्यों का नाश करता है तथा सप्तम राशि (वृष) में पापग्रह बैठा हो तो धान्यों की उत्पत्ति का भी नाश करता है।
यदि वृश्चिक राशि में स्थित सूर्य से द्वितीय स्थान में पापग्रह स्थित होकर शुभग्रह से नहीं देखा जाता हो तो पहली बोई हुई खेती का नाश करता है, किन्तु बाद की बोई हुई खेती अच्छी तरह उपजती है।
वृश्चिक स्थित सूर्य से सप्तम (वृष) में एक और सप्तमभिन्न केन्द्र (कुम्भ या सिंह) में दूसरा पापग्रह (मङ्गल-शनि में से एक हो तो धान्यों का नाश करता है। यदि ये दोनों पापग्रह ( मङ्गल, शनि) शुभग्रहों (बुध, गुरु, शुक्र) है देखे जाते हों तो सर्वत्र नहीं; किन्तु कहीं-कहीं पर धान्यों का नाश करते हैं।
वृश्चिक-स्थित सूर्य से सप्तम और षष्ठ स्थान में दो पापग्रह मङ्गल और शनि बैठे हों तो धान्यों को निष्पत्ति होती है; किन्तु धान्यों का मौल्य महंगा पड़ता है।
पूर्व-स्थिति की तरह वृष राशिगत सूर्य के समय शारदीय धान्यों का नाश या निष्पत्ति पण्डितों को जानना चाहिये।
मेष आदि तीन राशियों (मेष, वृष, मिथुन) में गमन करता हुआ सूर्य यदि शुभग्रह से युत या दृष्ट हो तो ग्रीष्म में होने वाले धान्य सस्ते होते हैं तथा लोक-परलोक दोनों के लिये उपयुक्त होते हैं; जैसे कि बहुत सस्ते धान्य होने के कारण बन्धुवर्गों के साथ खूब उपभोग करने से लोक और दानादि धर्मकार्य करने से परलोक दोनों बन जाते हैं। कहीं- कहीं पर 'अभयोपयोग्यम्' ऐसा पाठ मिलता है; जिसका अर्थ यह है कि ये अभीतिकारक होते हैं अर्थात् ऐसे समय में निर्भय मनुष्य रहते हैं।
इसी तरह धनु, मकर और कुम्भ में स्थित सूर्य यदि शुभग्रह से युत या दृष्ट हो तो शारदीय धान्यों की समर्पता तथा उभयोपयोग्यता (इहलोक और परलोक के लिये उपयुक्तता ) समझनी चाहिये। मेषादि या धनुरादि तीन राशियों में स्थित सूर्य यदि पापग्रह से दृष्ट या युत हो तो विपरीत फल ( महर्घता और नोभयोपयोग्य) समझना चाहिये। अतः संग्रह (विक्रय) काल में यही योग अच्छे होते हैं अर्थात् सूर्य के विपरीत योग में स्थित होने पर विक्रय करना चाहिये ।
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