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बृहत्संहिता • अध्याय 40 • श्लोक 13
त्रिषु मेषादिषु सूर्यः सौम्ययुतो वीक्षितोऽपि वा विचरन् । प्रेष्मिकधान्यं कुरुते समर्पमभयोपयोग्यं च ॥
मेष आदि तीन राशियों (मेष, वृष, मिथुन) में गमन करता हुआ सूर्य यदि शुभग्रह से युत या दृष्ट हो तो ग्रीष्म में होने वाले धान्य सस्ते होते हैं तथा लोक-परलोक दोनों के लिये उपयुक्त होते हैं; जैसे कि बहुत सस्ते धान्य होने के कारण बन्धुवर्गों के साथ खूब उपभोग करने से लोक और दानादि धर्मकार्य करने से परलोक दोनों बन जाते हैं। कहीं- कहीं पर 'अभयोपयोग्यम्' ऐसा पाठ मिलता है; जिसका अर्थ यह है कि ये अभीतिकारक होते हैं अर्थात् ऐसे समय में निर्भय मनुष्य रहते हैं।
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