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बृहत्संहिता • अध्याय 40 • श्लोक 14
कार्मुकमृगघटसंस्थः शारदसस्यस्य तद्वदेव रविः । संग्रहकाले ज्ञेयो विपर्ययः क्रूरदृग्योगात् ॥
इसी तरह धनु, मकर और कुम्भ में स्थित सूर्य यदि शुभग्रह से युत या दृष्ट हो तो शारदीय धान्यों की समर्पता तथा उभयोपयोग्यता (इहलोक और परलोक के लिये उपयुक्तता ) समझनी चाहिये। मेषादि या धनुरादि तीन राशियों में स्थित सूर्य यदि पापग्रह से दृष्ट या युत हो तो विपरीत फल ( महर्घता और नोभयोपयोग्य) समझना चाहिये। अतः संग्रह (विक्रय) काल में यही योग अच्छे होते हैं अर्थात् सूर्य के विपरीत योग में स्थित होने पर विक्रय करना चाहिये ।
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