जामित्रकेन्द्रसंस्थौ क्रूरी सूर्यस्य वृश्चिकस्थस्य । सस्यविपत्तिं कुरुतः सौम्यैर्दृष्टी न सर्वत्र ॥
वृश्चिक स्थित सूर्य से सप्तम (वृष) में एक और सप्तमभिन्न केन्द्र (कुम्भ या सिंह) में दूसरा पापग्रह (मङ्गल-शनि में से एक हो तो धान्यों का नाश करता है। यदि ये दोनों पापग्रह ( मङ्गल, शनि) शुभग्रहों (बुध, गुरु, शुक्र) है देखे जाते हों तो सर्वत्र नहीं; किन्तु कहीं-कहीं पर धान्यों का नाश करते हैं।
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