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अध्याय 27 — अथ वातचक्राध्यायः
बृहत्संहिता
11 श्लोक • केवल अनुवाद
यदि आषाढ़ के पूर्णिमा के दिन सूर्यास्त काल में ईशान कोण की हवा चले तो पृथ्वी पर धान्य उत्तम रूप से होता है।
जिस आषाढ शुक्ल पूर्णिमा के दिन पूर्वी समुद्र के तरङ्गाग्र भाग से चालित होने के कारण घूमती हुई तथा सूर्य और चन्द्र के किरणरूप जटा से शोभित यायु आकाश से चलाती है, उस धर्ष में सब जगह नील वर्ण बाले मेघों से युत, शारदीय धान्यों को समृद्धि से महित और बसन्त ऋतु के अति समृद्धियुत धान्यों से भूषित सारी पृथ्वी शोभित होती
यदि आषाढ शुक्ल पूर्णिमा के दिन अस्त समय में अप्रतिहत गति वाली आग्नेय कोण की वायु चले तो उस वर्ष में सर्वत्र अग्नि की ज्याला से व्याप्त पृष्ठ वाली प्रज्वलित पृथ्वी अपने शारीरिक उष्ण उच्छ्रास के द्वारा भस्मों को वमन करती है अर्थात् पृथ्वी पर वृष्टि का अभाव, अग्नि का भय, प्रजाओं का नाश आदि उपद्रव होते हैं।
इस योग में आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिन सूर्यास्त समय में तालपत्र, लताओं की विस्तृति और वृक्षों से वाहनों को नचाते हुये, कठोर शब्द वाले दक्षिण तरफ की हवा चले 'हो तालरूप अङ्कुश से ताड़ित हस्ती की तरह मेष कृपण मनुष्य की तरह घोड़ो जलबिन्दु छोड़ता है, अर्थात् उस वर्ष में घोड़ो वृष्टि होती है।
इस योग में 'आषाढ शुक्ल पूर्णिमा के [त सूर्यास्त के समय में' समुद्र के समीप छोटी इलायचो, लवलो और लौंग के वृक्षों को घुमाते हुये यदि नैऋत्य तरफ की हवा चले तो भूख, प्यास से मरे हुए मनुष्यों की हड्डियों के टुकड़े की विस्तृति के भार से व्याप्त पृथ्वी उन्मत्त और अति चहल प्रेतवधू को तरह दिखाई देती है।
इस योग में ( आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिन सूर्यास्त के समय में) धूलि को उड़ाने से चलित केशर के आक्षेप से चशल और भयङ्कर हवा चले तो उस वर्ष में धान्यों से युत, प्रधानों (राजाओं) के युद्धों से व्याप्त, जगह-जगह पर निरन्तर बसा, मांस और रक्त से व्याप्त पृथ्वी होती है।
इस योग में (आषाढ शुक्ल पूर्णिमा के दिन सूर्यास्त के समय में) सधन शरीर बाली ( धूली के संयोग और सादिक होने के कारण), सपों के टुकड़ों का अनुकरण करने वाली यदि वायव्य कोण की हवा चले तो उस वर्ष में जल की धारा से आनन्दित, अति शब्द करने बाले मेढकों से युत, धान्यों को बीजोत्पतिरूप चिहों से मण्डित पृथ्वी पर सुखों की अधिकता होने के कारण भाग्य रोना की तरह पृथ्वी को जानना चाहिये।
ष्म के अन्त में (आषाढ शुक्ल पूर्णिमा के दिन) मेह से आच्छादित सूर्य के किरण होने पर (सूर्यास्त समय में) अति सुगन्ध वाले कदम्बपुष्यों के गन्ध से सुगन्धित उत्तर तरफ की हवा चले तो उस वर्ष में बिजली से उत्पत्र सम्पूर्ण कान्तियों का स्वरूप ज्ञान होने के कारण उद्यम युत तथा उन्मत्त की तरह मेघ मेषों से नष्ट चन्द्रकिरण वाली पृथ्वी को जल से पूर्ण करता है।
यदि आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी के दिन पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में मेघ वृष्टि करे तो उस वर्ष में वर्षा अच्छी होती है। यदि वृष्टि नहीं करे तो अवृष्टि होती है।
धर्मिष्ठाः प्रणतारयो नृपतयो आषाढ़ शुल्क पूर्णिमा के दिन सूर्यास्त समय में देवताओं के सेवनयोग्य, शीतल, भयङ्कर शब्द याले, पुत्राग, अगुरु और पारिजात के फूलों से सुगन्धित ईशान कोण की हवा चले तो उस वर्ष में पूर्ण जलरूप यौवन से युत और पके हुये धान्यों से व्याप्त पृथ्वी होती है तथा धर्मात्मा और शत्रुओं को वश में करने वाले राजा लोग ब्राह्मण आदि वों की सुचारू रूप से रक्षा करते हैं।
यदि चन्द्र और सूर्य के किरणों से तथा ताराओं से रहित आकाश नहीं हुआ तो उसको भाद्रपद नहीं कहना चाहिये क्योंकि; उसमें मेघ वृष्टि नहीं करता है।
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