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बृहत्संहिता • अध्याय 27 • श्लोक 4
तालीपत्रलतावितानतरुभिः शाखामृगान्त्रर्तयन् योगेऽस्मिन् प्लवति ध्वनिः सपरुषो वायुर्यदा दक्षिणः । तद्वद्योगसमुत्थितस्तु गजवतालाङ्कुशैर्घट्टिताः कीनाशा इव मन्दवारिकणिका मुझन्ति मेपास्तदा ॥
इस योग में आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिन सूर्यास्त समय में तालपत्र, लताओं की विस्तृति और वृक्षों से वाहनों को नचाते हुये, कठोर शब्द वाले दक्षिण तरफ की हवा चले 'हो तालरूप अङ्कुश से ताड़ित हस्ती की तरह मेष कृपण मनुष्य की तरह घोड़ो जलबिन्दु छोड़‌ता है, अर्थात् उस वर्ष में घोड़ो वृष्टि होती है।
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