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बृहत्संहिता • अध्याय 27 • श्लोक 3
यदा बह्नौ वायुर्वहति गगने खण्डिततनुः प्लवत्यस्मिन् योगे भगवति पतने प्रवसति । तदा नित्योद्दीप्ता ज्वलनशिखरालिङ्गिततला स्वगात्रोष्मोच्छ्वासैर्वमति वसुधा भस्मनिकरम् ॥
यदि आषाढ शुक्ल पूर्णिमा के दिन अस्त समय में अप्रतिहत गति वाली आग्नेय कोण की वायु चले तो उस वर्ष में सर्वत्र अग्नि की ज्याला से व्याप्त पृष्ठ वाली प्रज्वलित पृथ्वी अपने शारीरिक उष्ण उच्छ्रास के द्वारा भस्मों को वमन करती है अर्थात् पृथ्वी पर वृष्टि का अभाव, अग्नि का भय, प्रजाओं का नाश आदि उपद्रव होते हैं।
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