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बृहत्संहिता • अध्याय 27 • श्लोक 2
पूर्वः पूर्वसमुद्रवीचिशिखरप्रस्फालनापूर्णित- चन्द्रार्काशुसटाकलापकलितो वायुर्यदाकाशतः । नैकान्तस्थितनीलमेघपटला शारद्यसंवर्धिता वासन्तोत्कटसस्यमण्डिततला सर्वा मही शोभते ॥
जिस आषाढ शुक्ल पूर्णिमा के दिन पूर्वी समुद्र के तरङ्गाग्र भाग से चालित होने के कारण घूमती हुई तथा सूर्य और चन्द्र के किरणरूप जटा से शोभित यायु आकाश से चलाती है, उस धर्ष में सब जगह नील वर्ण बाले मेघों से युत, शारदीय धान्यों को समृद्धि से महित और बसन्त ऋतु के अति समृद्धियुत धान्यों से भूषित सारी पृथ्वी शोभित होती
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