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बृहत्संहिता • अध्याय 27 • श्लोक 10
( ऐशानो यदि शीतलोऽमरगणैः संसेव्यमानो भवेत् पुत्रागागरुपारिजातसुरभिर्वायुः प्रचण्डध्वनिः । आपूर्णोदकयौवना वसुमती सम्पन्नसस्याकुला रक्षन्ति वर्णास्तदा ॥
धर्मिष्ठाः प्रणतारयो नृपतयो आषाढ़ शुल्क पूर्णिमा के दिन सूर्यास्त समय में देवताओं के सेवनयोग्य, शीतल, भयङ्कर शब्द याले, पुत्राग, अगुरु और पारिजात के फूलों से सुगन्धित ईशान कोण की हवा चले तो उस वर्ष में पूर्ण जलरूप यौवन से युत और पके हुये धान्यों से व्याप्त पृथ्वी होती है तथा धर्मात्मा और शत्रुओं को वश में करने वाले राजा लोग ब्राह्मण आदि वों की सुचारू रूप से रक्षा करते हैं।
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