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बृहत्संहिता • अध्याय 27 • श्लोक 6
यदा रेणूत्पातैः प्रविचलसटाटोपचपलः प्रवातः पश्चाच्चेद्दिनकरकरापातसमये । तदा सस्योपेता प्रवरनिकराबद्धसमरा क्षितिः स्थानस्थानेष्वविरतवसामांसरुधिरा ॥
इस योग में ( आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिन सूर्यास्त के समय में) धूलि को उड़ाने से चलित केशर के आक्षेप से चशल और भयङ्कर हवा चले तो उस वर्ष में धान्यों से युत, प्रधानों (राजाओं) के युद्धों से व्याप्त, जगह-जगह पर निरन्तर बसा, मांस और रक्त से व्याप्त पृथ्वी होती है।
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